बुधवार, 1 मार्च 2017

जन्मदिन की हार्दिक शुभ कामना बच्चा लोग

                                 
मार्च माह के आगमन के साथ ही मानो मेरे लिए पर्व माह की शुरुवात हो जाती है  
आज एक मार्च को मेरी छोटी बिटिया यानी मेरे बेटे " कनक " का जन्मदिन होता है एक नटखट सा जल्दी ही सबमें घुलमिल जाने वाला व्यक्तित्व, अपने माता-पिता के अलावा सबकी आँखों का तारा, सबका प्यारा है मंच सञ्चालन, प्रस्तुति  के लिए कनक कभी भी तैयार रहती है   

तीन मार्च को मेरे छोटे भाई विपुल का जन्मदिन है प्रोफ़ेसर साहब छोटे होने के कारण हमारी पीढ़ी के लाडले हैं



सत्तरह मार्च को मेरी बड़ी बिटिया वंशिका का जन्मदिन है बांसुरी का तात्पर्य रकने वाले नाम उच्चारण की वंशिका का कला में कोई सानी नहीं है कम उम्र में उम्दा कला की साधना को पाने का उसका सफल प्रयास है गणेश जी की मिटटी की प्रतिमा बनाना सीख कर “वंश” ने दूसरों को भी सिखाना प्रारंभ किया                     
वैसे कहते हैं की मार्च में जन्मे लोग जिम्मेदारियों का निर्वाह बहुत अच्‍छे तरीके से करते हैंइसलिए कामयाबी इनके कदम चूमती है। किसी भी विषय पर बोलने या लिखने से पहले ये उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं । कहा यह भी जाता है की यह लोग  कानून और नियमों को मानने वाले होते हैं । मार्च महीने में जन्‍म लेने वाले व्‍यक्ति अत्‍यधिक मिलनसार और आकर्षक होते हैं- यही इनकी शक्ति भी है और यही इनकी दुर्बलता भी । लोग इनकी इसी खामी यां गुणवत्ता का फायदा उठाते हैं । मार्च में पैदा होने वाले लोगों के लिए जीवन का स्वर्णिम काल होता है यानी की मार्च में जन्मे बालक न केवल कला में महारत लिए होते हैं । बल्कि उनका व्यक्तित्व  इस कदर आकर्षक होता है कि हर कोई उनका प्रशंसक बन जाता है । मार्च में जन्म लेने वालों के बारे में यह भी कहा जाता है की, यह लोग अपने लक्ष्य के प्रति लापरवाह होते हैं । लेकिन समय-समय पर अपने शौक में परिवर्तन करते रहते हैं । कनक – वंश – विपुल  तीनो में यह समाहित है । धनागम निरंतर होता है लेकिन इनके पास टिकता नहीं है ।
                                     ......तो जन्मदिन की हार्दिक शुभ कामना बच्चा लोग 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

भोर की पहली किरण

भोर की पहली किरण 
पक्षियों का कलरव 
चाह कर भी बिस्तर
से न निकले का मन 
                          उमंग उत्साह के पन्नो 
                          की उधेड़ बुन में
                          दिन भर के
                          ताने बाने बुनते हुए
                          न जाने कब सुबह हो गई..
थकान और पसीने की
बदबू, मिटटी की सौंधी
खुशबु
गोधुली पर गोरज से
माथा सजाये
लौट कर थकान
कैसे मिटायें
                          इस धीमी सोच में
                          सूरज ढल गया
                          घर पहुंचा तो
                          तेरा मुस्कुराता चेहरा देख
                          दिन भर का सारा कशमकश
                          रफूचक्कर हो गया
तेरी यह मुस्कान ही
मेरे जीने का अदब है..
गुनगुना रहा हूँ यह गीत
तू ही मेरा जीवन है...
                              विशाल

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

मातैय - माते त्वानू लखा, करोड़ा प्रणाम

मातैय - माते त्वानू लखा, करोड़ा प्रणाम
परमपूजनीय दादी माँ को हम सब के बीच से गए हुए दो वर्ष हो गया.. वक्त तेज़ी से भागता चला जाता है किन्तु चिर-स्मृतियाँ छोड़ता चला जाता है. यह कहना कठिन है की समय के साथ सबकुछ भुलाया जाता है. क्योंकि सीख जीवन के हर मोड़ पर एक राह , हिम्मत बनकर कड़ी दिखाई देती है. 
अबके अत्यधिक प्रगतिवादी माहोल में भी हमारे उन अशिक्षीत बुजुर्गों के तजुर्बे एक ढाल की तरह सामने आते हैं. फिर हम कैसे कह सकते हैं की की समय सब कुछ भुला देता है.
                                       



पूज्यनीय दादी जी को परिवार के सभी सदस्य माताजी, मातैय यां माते कहते थे . मातैय शब्द पंजाबी का अपभ्रंश है , और भी कई शब्दों को तोड़ मरोड़ कर बोला जाता है. खैर 
मातैय हमारे बीच समाये हुए हैं, हम गौरवान्वित हैं ऐसे महान व्यक्तित्व के बच्चे हो कर..  आप हर समय हमारे स्मरण में रहेंगे.
किन्तु आज आपके पुण्यस्मरण पर बस इतना ही मातैय - माते त्वानू लखा, करोड़ा प्रणाम..

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

बस मीठा मीठा बोलो

                                           


शीर्षक से याद आया की टीना मुनीम और देव आनंद अभिनीत फिल्म ‘मनपसंद’ सन 1980 में प्रदर्शित हुई थी। इसमें मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया, राजेश रोशन के संगीत से सजा एक गीत था ...

लोगो का दिल अगर हा जितना तुमको है तो बस मीठा मीठा बोलो
लोगो का दिल अगर हा जितना तुमको है तो बस मीठा मीठा बोलो

चले है जैसे कहीं शीशे पे आरी
कानो को लगे है आवाज़ तुम्हारी
चले है जैसे कहीं शीशे पे आरी
कानो को लगे है आवाज़ तुम्हारी
कहना है कुछ अगर तो बोलो में मिशरी घोलो
बस मीठा मीठा बोलो

साज़ छुपा है जब सीना-ए-दिल में
गीत तुम्हारे है तो फिर मुश्किल में
साज़ छुपा है जब ई-ए-दिल में
गीत तुम्हारे है तो फिर मुश्किल में
सब से तुम्हे अगर हा आगे बढ़ना है तो
बस मीठा मीठा बोलो

सौ मे से एक है बात पते की दिन हो सुरीला तो रात मज़े की
सौ मे से एक है बात पते की दिन हो सुरीला तो रात मज़े की
अपना यह माल अगर हाँ बेचना तुम को है तो
बस मीठा मीठा बोलो
लोगों का दिल अगर हा जितना तुमको है तो बस मीठा मीठा बोलो..



गीत भले ही वर्ष १९८० में लिखा गया हो लेकिन ज्ञान आज भी बाँट रहा है . यह अलग बात है की कुछ लोग सीधी बात में विश्वास  करते हैं और अपना परोक्ष - अपरोक्ष नुकसान कर जाते हैं. वही कुछ इस मीठा बोलने के नियम को अपना कर ज़हरीला वार भी कर जाते हैं. विगत ०८ नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी जी ने एक ही वार में सभी को अचंभित कर दिया. देश का समझदार - मासूम यां अनभिज्ञ बना तबका दिल से तो इस अभूतपूर्व ऐतिहासिक निर्णय पर गालियाँ दे रहा होगा, लेकिन बाहर तो उसे भी मज़बूरी कहो यां समर्पण.. बस मीठा मीठा बोलो.. अब यही देखो बाबा रामदेव ने लोकसभा चुनाव से पहले देश में घूम घूम कर पांच सौ - एक हज़ार के नोट बंद करने की बात की थी. रामदेव बाबा दूरदर्शी निकले और बस मीठा मीठा बोलो का सूत्र अपनाते हुए पतंज़ली की कायापलट करने का काम करते रहे, सफलता उनके कदम चूम रही है. जिन दादी-नानी के घरेलु नुस्खों को एक समय में नीम हाकिम खतरे जान माना जाने लगा था, आज उनमे से कुछ हम बदलते दौर के साथ अपनाने लगे हैं . दिल्ली में विगत माह में फैले चिकुनगुनिया, डेंगू के लिए उपचार के साथ पतंज़ली के गिलोय वटी उत्पाद की बेहद मांग बढ़ी. कुछ स्टोर्स पर यह प्रोडक्ट आउट ऑफ़ स्टोक तक हो गया था. मुझे याद है की बचपन में गाँव-कस्बों में बुखार होने पर गिलोय बेल की छाल चबाने के लिए कह दिया जाता था. यह अलग बात है की उस समय की यह असभ्य हरकते आज मजबूरीवश सभ्य समाज का अंग बन रही हैं. कारण साफ़ व स्पष्ट है बस मीठा मीठा बोलो .. अपने फायदे के दरवाज़े खोलो.. अरे भाई देखा नहीं आपने फिल्म मनपसंद की हिरोइन टीना मुनीम भी तो मीठा मीठा बोलो को अपनाकर अपनी कडवी दातुन बेच रही है. 

सोशल मीडिया का वात्सप, फेसबुक टूल्स अब ज्ञान का असीम भण्डार होते जा रहा है. सभी ज्ञान परोसू  टाइप के लोग सुबह से ही अपने कार्य संचार में व्यस्त हो जाते हैं.. ऐसा ही एक ज्ञान आया की..
मीठा बोलने वाला कभी हितेषी नहीं होता नमक की तरह कड़वा ज्ञान देने वाला ही सच्चा मित्र होता है। इतिहास गवाह है की आज दिन तक कभी नमक में कीड़े नहीं पड़े और मिठाई में कीड़े के साथ बीमारी भी होती है..!
सोचने में कोई बुराई नहीं है की मीठे में व मीठे से कीड़े लगने की बिमारी हो सकती है. रविश कुमार भी ऐसा ही कुछ मीठा बोल कर लोगों को अपना करने का काम कर रहे हैं, यह अलग बात है की वह सिर्फ अपने व अपने मालिकों के हित में मीठा बोलते हैं , मजीठिया के लिए लड़ रहे पत्रकारों के शोषण को लेकर उनकी मिठास ख़त्म हो जाती है. अपनी अपनी मज़बूरी है. सोशल ज्ञान के अन्दर पढ़ा था की “ वाणी में इतनी शक्ति होती है कि कड़वा बोलने वाले का शहद भी नहीं बिकता और मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है। ” लेकिन मीठा बोलने का तात्पर्य बदल चुके हैं , जिन्हें समझना होगा. लोगो का दिल अगर हा जितना तुमको है तो बस मीठा मीठा बोलो वाली पंक्ति के बीच छिपे अर्थ को भी समझना होगा. यह अर्थ भी "अर्थ " के हिसाब से बनते बिगड़ते रहते हैं. आप जब तक किसी के साथ भी "अर्थपूर्ण " रिश्ते रखते हैं, तबतक आप नमक की तरह कडवा ज्ञान देने वाले होने के बावजूद आप अच्छे होते हैं. संत तुलसीदास जी की चौपाई का सार समझना होगा तुलसी मीठे वचन तै, सुख उपजत चहुं ओर। वशीकरण के मंत्र हैं, तज दे वचन कठोर।इस के भावार्थ में कठोर वचन त्यजने को वशीकरण के मन्त्र नहीं कहा जा रहा बल्कि आज के परिवेश में सीधा सीधा अर्थ वशीकरण ही हो गया है..  खैर हम गहरे तक नहीं जाते सिर्फ अर्थ -अनर्थ से परे एक ही बात कहते हैं ..सौ मे से एक है बात पते की दिन हो सुरीला तो रात मज़े की, सब से तुम्हे अगर हा आगे बढ़ना है तो, बस मीठा मीठा बोलो..
               ...दातुन..काले दातुन..दस दस पैएसे ले लो...
                                ऐ बाबू !  ले लेना बाबू..


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                                                                                  विशाल चड्ढा 



सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

शिरपुर का विख्यात सितारा स्मिता पाटिल, अदाकारी के लिए आज भी मिसाल






महाराष्ट्र के धुलिया जिले की शिरपुर तहसील में आगरा मुंबई महामार्ग पर स्थित दहिवद गाँव से गुजरते समय महान अदाकारा स्मिता पाटिल का स्मरण हो आता है. स्मिता पाटिल पब्लिक स्कूल वा शिरपुर सहकारी सूत गिरनी के सामने गुजरते हुए किसी  ना किसी से पता चल जाता है की स्मिता पाटिल का यहाँ से कोई गहरा सम्बन्ध है. हालांकि स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर, 1956 को पुणे में हुआ था , किन्तु उनके पिता शिवाजी  गिरधर पाटिल की शिरपुर राजनीतिक कर्म भूमि , पैत्रिक भूमि रही है. स्मिता पाटिल के पिता शिवाजीराव गिरधर पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री, राज्यसभा सदस्य  और मां विद्या ताई पाटिल सामाजिक कार्यकर्ता थीं. स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शिवाजीराव पाटिल व उनके भाई उत्तम नाना पाटिल का योगदान बताया जाता है. अंग्रेजों के खज़ाना लुटने की चिमठाना लूटकांड की घटना में इस परिवार का योगदान माना जाता है. खैर राजनीतिक पृष्ठ भूमि के कारण स्मिता पाटिल की योग्यता, व्यक्तित्व को हल्का नहीं माना जा सकता. उनकी अपनी एक विख्यात छवि रही है. 




अपने अभिनय वा अदाकारी से स्मिता पाटिल ने मात्र दस वर्ष के करियर में दर्शकों के बीच खास पहचान बना ली थी . उनका बनाया गया वह मुकाम आज भी दर्शकों के दिलों पर राज़ करता है. बड़ी-बड़ी खूबसूरत आंखों और सांवली-सलोनी सूरत से सभी को आकर्षित करने वाली अभिनेत्री स्मिता पाटिल का नाम हिंदी सिनेमा की बेहतरीन अदाकाराओं में शामिल  है. मराठी समाचार वाचिका के रूप में अपने करियर की शुरुवात करने वाली स्मिता पाटिल का प्रारम्भिक शिक्षण मराठी में हुआ था. राजनीतिक वा सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण फिल्म क्षेत्र के लोग उनके परिवार से जुड़े हुए थे. उसी दौरान स्मिता पाटिल की मुलाकात जाने माने निर्माता निर्देशक श्याम बेनेगल से हुई और उन्होंने स्मिता पाटिल को चरण दास चोर में छोटी सी भूमिका दी. बस यही से सिनेमा इतिहास में स्मिता पाटिल के साथ श्याम बेनेगल दो दिग्गज सितारों का उदय हुआ. स्मिता के फिल्मी करियर की शुरुआत अरुण खोपकर की फिल्म 'डिप्लोमा' से हुई, लेकिन मुख्यधारा के सिनेमा में स्मिता ने 'चरणदास चोर' से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. स्मिता पाटिल ने 'भूमिका', 'मंथन', 'मिर्च मसाला', 'अर्थ', 'मंडी' और 'निशांत' जैसी रचनात्मक व  अमिताभ बच्चन के साथ 'नमक हलाल' और अन्य फिल्म 'शक्ति' व्यावसायिक फ़िल्में की. स्मिता पाटिल को वर्ष 1977 में 'भूमिका', 1980 में 'चक्र' में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त किया. इसके साथ ही उन्होंने वर्ष 1978 में 'जैत रे जैत', 'भूमिका', वर्ष 1981 में 'उंबरठा', 1982 में 'चक्र', 1983 में 'बाजार', 1985 में 'आज की आवाज' के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता.


शिरपुर के मेरे पत्रकार मित्र, संपादक, बडे भाई आदरणीय अशोक श्रीराम (शिवाजी राव पाटिल के करीबी) के साथ मुझे वर्ष १९९२ में स्मिता पाटिल की माता जी विद्या ताई पाटिल से मिलने व उनका साक्षात्कार लेने का अवसर मिला. उस समय स्मिता पाटिल को दुनिया से विदा हुए काफी वर्ष नहीं हुए थे . राजबब्बर से जुड़े प्रश्नों व मिडिया में आ रही अधूरी जानकारी से विद्या ताई पाटिल अच्छी खासी खफा थी. विवाहित राज बब्बर से स्मिता के विवाह को लेकर विद्या ताई विरोध में थी. यही वज़ह थी की वह अपनी बेटी की मौत के लिए राज बब्बर को जिम्मेदार मानते हुए उनसे नफरत करती थी . मेरे एक ऐसे ही किसी प्रश्न पर भी विद्या ताई भड़क गई थी. बाद में उन्होंने स्थिति को संभालते हुए स्मिता पाटिल से जुडी कई यादगार बातें सांझा की. वहीँ पर जानकारी मिली की स्मिता फिल्म में आदिवासी किरदार निभाने के लिए उस किरदार में जान फूंक देती थी, इसके लिए उन्होंने शहादा तहसील के मंदाना गाँव में जा कर आदिवासी परिवारों के साथ रहकर उनके रोज़मर्रा आचरण का अध्ययन भी किया, इसी सीखी गई सजीवता को स्मिता ने बखूबी अपने किरदार में उतारा. तत्कालीन धुलिया जिले के इस मंदाना गाँव के लोगों को बाद में पता चला की वह अब तक सदी की एक कलात्मक प्रख्यात नायिका के साथ रह रहे थे. फिल्म जगत में स्मिता पाटिल के घमंडी व अव्यवहारिक होने के आरोप भी लगते रहे हैं. विद्या ताई पाटिल बताती थीं की नाहक ही स्मिता के प्रति मीडिया अपना द्रष्टिकोण रखता था . स्मिता पाटिल अपनी माता जी से प्रेरित हो कर सामाजिक कार्यों से जुडी हुई थी. वह मुक्त मन से सुधारवादी कार्यों में रूचि ले रही थी. फिल्म जगत में नारी शोषण पर बेबाकी से अपनी राय रखते हुए स्मिता का कहना था  की फ़िल्मी दुनिया में उसी के लिए स्थान है जिसके भीतर प्रतिभा है. लड़कियां काम पाने के लिए इज्जत दांव पर लगा देती हैं, जिससे उन्हें एक-दो फिल्मों में तो काम मिल सकता है किन्तु वह अपना मुकाम नहीं बना सकती. स्मिता की यह बेबाकी उनकी माँ विद्या ताई की ही देन थी.
स्मिता पाटिल सामाजिक कार्यों के साथ अपने पिता की राजनीतिक विरासत सँभालने का भी मन बनाती थी. किन्तु वह स्पष्ट नहीं थी की कभी राजनीती में आएँगी भी यां नहीं ? हाँ एक बार वह अपने पिता शिवाजी राव पाटिल के चुनाव प्रचार में हिस्सा लेने शिरपुर जरुर आईं थी. हमारे मित्र अशोक श्रीराम ने मुझे बताया था की वह चुनाव प्रचार के लिए जब तहसील में घूमीं थी तो राजनीतिक हालत देख कर स्मिता की शायद कोई रूचि नहीं रह गई थी . यही कारण है की स्मिता पाटिल ने फिर कभी पिता के कार्य में सक्रियता नहीं दिखाई. 
अभिनय के क्षेत्र का यह चमकता सितारा अपने यादगार सजीव किरदारों से सिर्फ स्मृतियाँ छोड़ गया. स्मिता पाटिल की मौत भी एक रहस्य बन कर रह गई. अभिनय क्षेत्र की यह संजीदगी, सलोनी सी मूरत मात्र दस वर्षों के अपने अभिनय से सदियों तक की यादगार कहानी बन कर रह गई. शिरपुर में भले ही स्मिता पाटिल ने अधिक समय ना बिताया हो किन्तु यह सत्य है की शिरपुर वासी आज भी अपनी भूमि से उपजे इस कोहिनूर हीरे को उतनी ही शिद्दत के साथ याद कर आदर प्रकट करते हैं.

-                                                                                     -विशाल चड्ढा  


शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

स्टेज डेयरिंग

यह है हमारी बिटिया रानी कनक ! मेरी पत्नी मोनिका चड्ढा ने कल बताया की रविवार को स्कूल के ऑडिटोरियम में लगभग पांच सौ बच्चों को फिल्म दिखानी थी . अचानक लेपटोप में कोई तकनिकी खराबी आ गई, तो कोई इंग्लिश गाना लगा दिया गया. कनक इतनी भीड़ में से उठ कर स्टेज पर गई और मुक्त स्वरुप में डांस करने लग गई. उसकी इस स्टेज डेयरिंग को देख कर सभी बच्चों ने चियर्प करना, तालियाँ बजाना प्रारंभ कर दिया. बाद में दुसरे बच्चे भी कनक को देख कर स्टेज पर आ गए. ग्रेट.... 


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                                                   कनक का स्टेज परफोर्मेंस