जलगाँव – ( विपुल पंजाबी ) पूरे देश में दिपावली व भाईदूज का पर्व समाप्त होने के बाद जलगाँव जिले के बोदवड तहसील के येवती गांव में दीपावली व भाईदूज पर्व मनाया जाता है । आज शुक्रवार 1 नवम्बर को येवाती गाँव में दिवाली के साथ भाई दूज पर्व मनाया जा रहा है। दिवाली के बाद आनेवाली पंचमी को येवती गांव के लोग दिवाली व भाईदूज एकसाथ मनाते है। बोदवड तहसील के इस येवती गांव में दीपावली के अवसर पर त्यौहार न मनाते हुए बाद में दीपावली व भाईदूज एकसाथ मनाए जाने की लगभग ४०० साल पुरानी परंपरा है। इन्ही परंपराओं के अंतर्गत पुरे देश में भाईदूज मनाई जाती है, तब बोदवड का येवती गांव त्यौहार से दूर रहता है । येवती गांव में इन परंपराओं का निर्वाह करते हुए अंबऋषी के मंदिर को आस्था का केंद्र रखा जाता है। महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि भारत वर्ष में ऐसी परंपराओं का निर्वाह करने वाला यह एक मात्र मंदिर है । येवती गांव में इन परंपराओं का निर्वाह करते हुये विगत भाईदूज नहीं मनाई गई । पौराणिक कथाओं के आधार पर बोदवड तहसील के येवती गांव में प्राचीन काल के अंब ऋषि द्वारा स्थापित की गयी दीपावली को ही महत्व दिया जाता है। ऐस...
भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु बाबूजी से मिलने दो बार चालीसगांव आये थे. बताते है कि 48 साल तक केकी मुस उर्फ़ बाबूजी ने चालीसगांव से बाहर सिर्फ दो बार कदम रखा. एक बार मां की मृत्यु पर उन्हें औरंगाबाद जाना पड़ा. दूसरी बार जब वे अपने बंगले से निकलकर चालीसगांव रेलवे स्टेशन पर विनोबा भावे की तस्वीर लेने आये. मां ने पहचानी प्रतिभा - चालीसगांव में केकी मूस के पिता सोडा वाटर की फैक्टरी के साथ-साथ शराब की दुकान चलाते थे. बेटा कला की पढ़ाई करने विदेश जाना चाहता था. पर मां-बाप इकलौते बेटे को इतनी दूर भेजने के लिए तैयार नहीं थे. वर्ष 1934-35 में पिता की मौत के बाद मां पिरोजाबाई ने फैक्टरी की जिम्मेदारी अपने कंधे लेते हुए बेटे को इंग्लैण्ड जाने की इजाजत दे दी. चालीसगांव में अब केकी मूस उर्फ़ बाबूजी के नाम पर उनके कुछ साधकों द्वारा केकी मूस आर्ट ट्रस्ट चलाया जा रहा है. ट्रस्ट के सचिव कमलाकर सामंत ने बताया कि बाबू जी ने 300 से अधिक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते थे . लेकिन उनके जीते जी यह बात कि...
हिंदी के प्रख्यात व्यंगकार डा.शंकर पुणतांबेकर का निधन हिंदी साहित्य में व्यंग्यविधा के पुरोधा कहे जाने वाले डा.शंकर पुणतांबेकर का रविवार ३१ जनवरी दोपहर १.३० बजे निधन हो गया। वह ९२ वें वर्ष के थे। हाल ही में विगत ८ जनवरी २०१६ को उन्होने अपना जन्म दिन मनाया। शंकर पुणतांबेकर के उपरांत उनके तीन बेटे, बेटी, बहुएं, नाती पोते से भरा पुरा परिवार मौजुद है। साहित्य क्षेत्र में व्यंग्य लेखक के रूप में एक बडा नाम डा.शंकर पुणतांबेकर रहन सहन में एक साधारण व्यक्तीत्व व असाधारण प्रतिभा थे। उनका जन्म मध्यप्रदेश के गुणा जिले के कुंभराज में वर्ष १९२५ में हुआ था। शंकर रघुनाथ पुणतांबेकर के रूप में प्रचलित साहित्यकार की प्राथमिक शिक्षा, दिक्षा, विदिशा, ग्वालियर व आग्रा में हुई। उन्होने हिंदी में पीएच.डी. करते हुए जलगांव के मुलजी जेठा महाविद्यालय में वर्ष १९६० से १९८५ तक लगातार २५ वर्ष अध्यापन कार्य किया। वर्ष १९८५ में अवकाश प्राप्ती के उपरांत वह सीधे साहित्य सेवा व ...
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